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Poem : Where The Mind is Without Fear





Where The Mind is Without Fear

Where the mind is without fear and the head is held high;
Where knowledge is free; Where the world has not been broken up into fragments by narrow domestic walls;
Where words come out from the depth of truth;
Where tireless striving stretches its arms towards perfection;
Where the clear stream of reason has not lost its way into the dreary desert sand of dead habit;
Where the mind is led forward by thee into ever-widening thought and action
Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.

                                                          - Guru Rabindranath Tagore
 
Vikas Sood : This great poem has inspired many people in India and awakens the spirit of freedom in every human being.


जहां चित्‍त भय से शून्‍य हो 



जहां चित्‍त भय से शून्‍य हो
जहां हम गर्व से माथा ऊंचा करके चल सकें
जहां ज्ञान मुक्‍त हो
जहां दिन रात विशाल वसुधा को खंडों में विभाजित कर
छोटे और छोटे आंगन न बनाए जाते हों
जहां हर वाक्‍य ह्रदय की गहराई से निकलता हो
जहां हर दिशा में कर्म के अजस्‍त्र नदी के स्रोत फूटते हों
और निरंतर अबाधित बहते हों
जहां विचारों की सरिता
तुच्‍छ आचारों की मरू भूमि में न खोती हो
जहां पुरूषार्थ सौ सौ टुकड़ों में बंटा हुआ न हो
जहां पर सभी कर्म, भावनाएं, आनंदानुभुतियाँ तुम्‍हारे अनुगत हों
हे पिता, अपने हाथों से निर्दयता पूर्ण प्रहार कर
उसी स्‍वातंत्र्य स्‍वर्ग में इस सोते हुए भारत को जगाओ 


                                                                - गुरू रवीन्द्रनाथ टैगोर


(हिन्दी रूपान्तरण - कवि शिवमंगल सिंह "सुमन")

यह कविता असंख्य भारतीयों के लिये प्रेरणा का स्रोत है और हर मनुष्य में स्वतन्त्रता की भावना जागृत करती है।